हम और हमारा जीवन

      हम मुस्लमान हैं। क्योंकि हम अल्लाह को एक पालनहार मान कर उस के साथ अनेक ईश्वर के होने को पुरे ह्रदयी दिल एवं दिमाग से बहिष्कार एवं इन्कार किये हैं। और हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को उसके बंदे और रसुल माने हैं।
      नमाज अदा करते हैं। ज़कात देते हैं। रमज़ान महिने के रो़जा रखते हैं। काबा़ शरीफ के तीर्थ के खर्च उठाने के ताकत होने पर हज़ भी करते हैं। 

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