हम और हमारा समाज

 


हम जिस समाज में रहते हैं। उस समाज को क्या नाम दूं समझ में नहीं आ रहा है। कभी तो ऐसा लगता है कि इससे इस्लामी समाज का नाम दूं और कभी-कभी ऐसा लगता है की इसे जिस नाम से भी पुकारो उसी में फिट नहीं खाएगा। ऐसा माहौल है ऐसा समाज है कि किसी नाम के काबिल नहीं। कभी तो ऐसा लगता है कि समाज के रहने वाले को इस्लामी नाम पर पुकारूं। और कभी कभी ऐसा लगता है कि उसे बुराई का अड्डा के नाम से पुकारूं। कभी ऐसा लगता है कि भलाई नाम की कोई चीज मिलने का कोई उम्मीद ही नहीं। जुल्म अत्याचार का माहौल गरम है। न्याय नाम का कोई चीज ही 
नहीं। सभी कोर्ट कचहरी में अन्याय का बोलबाला है। हर तरफ लोग परेशान नजर आ रहे हैं कोई इंसाफ इंसाफ का भीख मांग रहा है। बचाओ बचाओ के नाम पर गीत गाए जा रहा है। जिसके कोई सुनने वाला नहीं। सभी एक दूसरे के खिलाफ बातें कर रहे हैं पीठ पीछे बुराई कर रहे हैं। उसको गिराने के चक्कर में लगे रहते हैं। उसकी जमीन जायदाद को हड़पने के चक्कर में लगे हुए है। कोई अगर कुछ अच्छा कर रहा है तो हजार लोग उसके पीछे उसकी बुराई करने में लगे रहते हैं। कोई अगर बड़ा आदमी बन जाता है तो कहता फिरता है जरूर कोई गड़बड़ क्या होगा किसी का माल हड़पा होगा किसी से बेईमानी की होगी या फिर हराम का माल होगा। कोई अगर समाज में किसी का मदद करता है। किसी की सहायता करता है तो फिर भी बदनाम हो जाता है इस वजह से की यह जरूर किसी स्वार्थ के बिना पर उसकी मदद की होगी।

महसूस यह होता है के दौरे तबाही है। 

शीशे की अदालत में पत्थर की गवाही है। 

हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम। 

कोई कत्ल भी कर देता है तो चर्चा नहीं होता।

दोस्तों! समझ में नहीं आ रहा है कि समाज इतना बुरा काहे को हो गया। उसे अच्छाई और सच्चाई क्यों नहीं दिखता। वह इतना अंधा क्यों हो चुका है। समाज के अंदर अगर एक या दो व्यक्ति अच्छा होता है तो फिर उसे हमेशा लंबे-लंबे ताने सुनने पड़ते हैं। उनकी अच्छाई और सच्चाई समाज की बुराई के सामने मुंह की खा जाती है। क्या मजाल की कोई अच्छा करे तो उसकी बाहबाही करने वाला उसके पीठ थपथपा ने वाला उसकी पीठ थपथपाई।

 शादी बिहा में तो ऐसा ढोंग रचा जाता है कि मत बोलिए खून के आंसू बहते हैं। कलेजा मुंह को आ जाता है। और सर शर्मिंदगी की वजह से झुक जाता है। इस्लाम के नाम पर शादी बिहा होने वाले गैर मजहबी रस्मो रिवाज अपना लिया है। और लड़की वालों को मोहर छोड़कर उल्टी उन लोगों से दहेज के नाम पर मोटा मोटा पैसा उसोल लेता है। ऊपर से बराती इतना ला लेता है। उसका कहने का हद नहीं। उसके खाने का इंतजाम वेज बिरियानी, चिकन बिरयानी, मटन बिरयानी, पुलाव, मछली, कबाब, पनीर, दही, नाश्ता, पापड़ एवं शराब इत्यादि चीजों का डिमांड भी रहता है। कि हमारे बराती के लिए इन सारी चीजों का होना अनिवार्य है। अगर नहीं है तो ऐसी सूरत में हमारी नाक कट जाएगी। ऊपर से फर्नीचर का सामान पूरा पूरा होना चाहिए। महंगा होना चाहिए। कुल मिलाकर लड़के वाले बिना कुछ अपना पैसा खर्च किए लड़की वालों से भीख मांग कर अपने लड़के की शादी दिलवाते हैं।

 अब बताइए भाई लड़की वालों का पैसा लेकर अपने लड़के की शादी तय कर आते हैं और उल्टे लड़की वालों पर इतना जुल्म अत्याचार इतना गुरुर घमंड कहां का इंसाफ है। लड़के वाले जैसे जानवर की तरह लड़की वालों पर टुट पड़ते हैं। उनकी इज्जत के ऊपर हमला करते हैं। उल्टी गिनती शुरु करवा देते हैं। उनका समाज में उठना बैठना बंद कर देते हैं। उनको किसी घाट के नहीं छोड़ते। उनको बर्बाद करके छोड़ देते हैं। ऊपर से बहू ऐसा होना चाहिए। वैसा होना चाहिए। ऐसा काम आना चाहिए। वैसा काम आना चाहिए। बोलो कि इस बात में हमारी हेल्प करें। उस बात में हमारी हेल्प करें। बहु बेचारी पूरी तरह ध्वस्त हो जाती है। कि पापा का इतना पैसा खर्च करने के बावजूद भी मुझे अच्छा घर नहीं मिला। मुझे इस तरह का व्यवहार मिला? मुझे इस तरह का परिणाम मिला? बिचारी और तकलीफ ना बर्दाश्त कर जहर का घूंट पी लेती है। और इस दुनिया को जानवर की दुनिया कहकर चली जाती हैं। 

 अरे बाबा होना तो चाहिए था कि अगर लड़की वालों ने बहुत ज्यादा पैसा खर्चा करके अपनी बेटी की शादी कराई है। तो अगर लड़का अच्छा मिल जाता है या फिर उसका घर अच्छा मिल जाता है। उसके ससुराल अच्छे मिल जाते हैं। उनकी देखभाल होती है। उनकी दुख सुख का ख्याल रखा जाता है। तो फिर इतना पैसा खर्चा करना एक बेटी के लिए अपने बाप का कुछ नहीं। सिवाय इसके कि उसकी बेटी ससुराल में खुश रहें। आबाद रहे। इतना खर्चा करने के बावजूद बेटी को सुख ना मिले। उन पर जुल्म अत्याचार का पहाड़ टूट पड़े। एक बाप कैसे जिंदा रह सकता है। एक बाप को कैसे नींद आ सकती है। एक बाप कैसे चैन कर सकता है। 


 कुल मिलाकर समाज में बुराई ही बुराई है। चारों तरफ बुराइयों का दौर दौरा है। गोया समाज में आप भलाई ना करें तो बेहतर है। ऐसे घुट-घुट कर जिंदगी बिता दें तो समाज के लिए बेहतर है। आपको आगे बढ़ने नहीं देगी। कुछ बड़ा करने नहीं देगी। वह नहीं चाहता कि आप कोई बड़ा काम करें। समाज के लोग बुराइयों का अड्डा है। इसको अच्छाई नहीं भाती है। एक दूसरे के खिलाफ बोलिए। एक दूसरे की बुराइयों में साथ दीजिए। समाज के साथ मिल बैठकर एक दूसरे की बुराई कीजिए।तभी आप अच्छे कहलाएंगे।

यह है हमारा समाज ????!!!!

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